हिज़ाब के नाम पर देश में इतना विवाद क्यों? क्या है आखिर पूरा मामला?

जब हम लोग स्कूल और कॉलेज में थे तब हम छात्रों को यह चिंता रहती थी की आज लंच में कौन क्या क्या लाया है या आज हम लंच ब्रेक में कौन सा गेम खेलेंगे। हम यह सोचते थे किसके टेस्ट में कितने नंबर आये है, अगला पीरियड कौन से टीचर का है और वो क्या पढ़ाएंगे।  पर आज के समय में हालात इस हद तक निचे गिर गए है कि देश के कुछ हिस्से में स्टूडेंट्स अब धर्म के नाम पर लड़ रहे है, इन स्टूडेंट्स को अब यह चिंता है की किसने क्या पहना है, कौन यहाँ हिज़ाब पहन रहा है और कौन भगवा। 

स्टूडेंट्स को यह चिंता है की किसके मुँह से जय श्री राम निकल रहा है और किसके मुँह से अल्लाह हु अकबर।  इस हद तक हमारे देश में धर्म के नाम पर में बटवारा हो गया है कि जिसकी कोई सीमा नहीं है।  

ख़बर यह आ रही है कि कर्नाटक के कई स्कूल और कॉलेजेस में लड़किओं के हिज़ाब पहनने पर बैन लग गया और उन्हें अंडर एंट्री नहीं दी जा रही है। उन्होंने इसके खिलाफ प्रोटेस्ट किया और जिसके रिस्पांस में कुछ लोगो ने भगवा पहनकर काउंटर पप्रोटेस्ट किया।  कुछ जगह पर यह प्रोटेस्ट नारे में बदले तो कही कही लड़किओं के साथ छेड़खानी भी की गयी।

हालात इस हद तक बिगड़ गए कि कर्नाटक के मुख्य मंत्री ने फैसला लिया कि स्कूल और कॉलेज को तीन दिन तक बंद कर दिया जाये।  यह जो कुछ भी हुआ बोहोत ही शर्मनाक हरकत थी, इसे गहराई से समझने के लिए हम इस मुद्दे को जड़ से समझने की कोशिश करते है।  

Source: Rewa Riyasat

हिज़ाब पहनना सही है या गलत? 

जो लोग हिज़ाब पहनने को सपोर्ट करते है उनका यह कहना है कि यह हमारे धर्म और हमारी परम्परा का एक अहम् हिस्सा है इसीलिए हम इसे छोर नहीं सकते। हमारे देश के संविधान के अनुच्‍छेद 25 से 28 तक में धर्म की स्‍वतंत्रता के मौलिक अधिकार को लेकर जिक्र किया गया है।

इंडियन कंस्टीटूशन के हर राइट में कुछ रिज़नेबल रिस्ट्रिक्शन्स दी गयी है, जैसे की देश की सम्प्रभुता और अखंडता पर कोई असर हो रहा हो, देश की सुरक्षा पर उसका असर हो रहा हो, पब्लिक आर्डर को उससे ठेस पहुंच रही हो, कंटेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट हो रहा हो, शालीनता और नैतिकता को वॉयलेट किया जा रहा हो ये सभी कारण दिए गए है किसी  भी अधिकार पर रिस्ट्रिक्शन लगाने पर, लेकिन हिज़ाब पहनना क्या देश की सुरक्षा के लिए कोई खतरे की बात है ? नहीं। क्या नैतिकता के लिए बेकार चीज़ है? नहीं।

पब्लिक आर्डर को भी इससे कोई नुकसान नहीं हो रहा।  एक औरत के हिज़ाब पहनने से किसी दूसरे को अगर कोई नुकसान नहीं हो रहा है तो इसे पहनने में कोई बुराई नहीं है। यह अपनी जगह एकदम ठीक है।  

दूसरी तरफ बात करते है इसके खिलाफ बोलने वालो की।  उनके द्वारा क्या आर्ग्यूमेंट्स दिए जाते है, जो लोग हिज़ाब के ख़िलाफ़ है उनका यह कहना है कि यह एक पितृसत्तामक व्यवस्था की एक निशानी है, ज्यादातर औरते हिज़ाब इसीलिए नहीं पहनती क्योंकि वो पहनना चाहती है बल्कि इसलिए पहनती है क्योंकि उनका समाज और उनका परिवार उन्हें मजबूर करता है इसे पहनने पर। 

यही सामान चीज़ हिन्दू समाज में लोग घूँघट के बारे में भी कहते है। यह बात भी अपनी जगह सही है क्योंकि कई देशो में औरते प्रोटेस्ट करने पर उतर आयी कंपल्सरी हिज़ाब के खिलाफ, क्योंकि उन्हें मजबूर किया जाता है हिज़ाब पहनने के लिए।  इसका एक हालही का उदाहरण है 2017 का इरानियन प्रोटेस्ट। यहाँ जो आर्गुमेंट है वो है फ्रीडम ऑफ़ चॉइस एंड वुमन एम्पावरमेंट को लेकर।  

पर यहाँ बात अलग ही है क्योंकि हमारे देश में ये जो विरोध करने वाले लोग है वो न ही वुमन एम्पावरमेंट वाले के पक्षधर है और न ही फ्रीडम ऑफ़ चॉइस के। यह लोग हिज़ाब के खिलाफ बस इसीलिए है क्योंकि वो इस धर्म से बहुत ज्यादा नफरत करते है, वो अपना प्रभाव मुस्लिमो पर बनाये रखना चाहते है और अपनी मर्जी उन पर थोपना चाहते है।  

आज दुनिया में हिज़ाब का मुद्दा इतना गरमाया क्यों ?

यह दिसंबर 2021 की बात है जब कर्नाटक का उडुपी ज़िला, उडुपी की सरकार प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ़ गर्ल्स से यह विवाद शुरू हुआ।  कुछ मुस्लिम छात्राओं ने यह आरोप लगाया कि उन्हें क्लास में हिज़ाब पहनने से रोका गया है, जनवरी में उन छात्राओं ने कॉलेज में ही प्रोटेस्ट शुरू किया जिसको स्थानीय मीडिया ने कवर किया, फिर इस प्रोटेस्ट का फायदा उठाते हुए अलग अलग संगठन इसमें शामिल हो गए। 

हिन्दू संगठन यह मांग करने लगे कि उन्हें भी स्कूल कॉलेज में धार्मिक प्रतीक इस्तेमाल करने की इज़ाज़त दी जाये, वहीँ मुस्लिम संगठन हिज़ाब पहनने देने की मांग कर रहे है।  फिलहाल यह मामला अदालत में पहुंच चूका है। 

क्या पहना जाये और क्या न पहना जाये यह पूरी तरह से व्यक्तिगत पसंद का विषय है।  भारत का संविधान अपने नागरिको को इस बात का पूरा अधिकार प्रदान करता है। अगर पहनावे, खानपान और रहन सहन का इस्तेमाल राजनीति होने लगे तो  इसका विरोध करना हमारा कर्त्तव्य है। इस तरह की राजनीति को सिरे से खारिज़ किये जाने की जरुरत है। धर्म के आधार पर बटकर नहीं बल्कि एकजुट होकर इंसान होकर मानवता का गुण प्रदर्शित कर इसपर गहन चिंतन की आवश्यकता है।  

अन्य शिक्षण संस्थान क्यों शामिल हुए?

इस घटना के बाद, कुंडापुर के गवर्नमेंट प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज में लड़कों का एक समूह हिजाब पहनकर कक्षाओं में भाग लेने वाली कुछ लड़कियों के विरोध में भगवा शॉल पहने कॉलेज गया। कुंडापुरा के विधायक हलदी श्रीनिवास शेट्टी ने अभिभावकों के साथ बैठक की और छात्रों से कॉलेज के ड्रेस कोड का पालन करने के लिए कहा जब तक कि सरकार इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय नहीं ले लेती।

विधायक ने कहा कि पिछले करीब पांच दिनों से कॉलेज की कुछ छात्राएं हिजाब पहनकर क्लास में आ रही है। दूसरी ओर, छात्राओं ने तर्क दिया है कि हिजाब पर रोक लगाने के लिए ‘ड्रेस कोड में अचानक बदलाव’ के बाद उन्हें कॉलेज से बाहर रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।

हिजाब पहनने वाली लड़कियों का मुकाबला करने के लिए, कई हिंदू लड़के भगवा शॉल पहन कर आ रहे हैं, लेकिन उन्हें भी कक्षाओं में प्रवेश करने से रोक दिया गया है। चिक्कमगलुरु में उस समय विवाद ने नया मोड़ ले लिया जब आईडीएसजी गवर्नमेंट फर्स्ट ग्रेड कॉलेज के छात्र नीली शॉल पहन कर पहुंचे। उन्होंने जय भीम के नारे लगाए और मुस्लिम लड़कियों के समर्थन में आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि वे धार्मिक अभ्यास के तहत कॉलेजों में हिजाब पहनने के समर्थन में हैं।

सरकार ने क्या कहा है?

कर्नाटक सरकार ने एक आदेश जारी किया जिसमें कहा गया कि छात्रों को कॉलेज विकास समितियों द्वारा निर्धारित वर्दी/ड्रेस कोड का पालन करना होगा। प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा मंत्री बी.सी. नागेश ने कहा कि कर्नाटक शैक्षिक अधिनियम 2013 और 2018 के तहत बनाए गए नियमों ने शैक्षणिक संस्थानों को स्कूल / पीयू कॉलेज के छात्रों के लिए वर्दी निर्धारित करने का अधिकार दिया है।

विभाग ने इन नियमों के आधार पर एक सर्कुलर जारी किया है और छात्रों से अपील की है कि जब तक इस मामले में हाई कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, तब तक वे कॉलेजों द्वारा निर्धारित यूनिफॉर्म नियमों का पालन करें.

हालांकि कॉलेजों में वर्दी अनिवार्य नहीं है, कॉलेज विकास समितियां, अक्सर स्थानीय विधायकों की अध्यक्षता में, उडुपी और अन्य जिलों में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने सहित एक ड्रेस कोड पर जोर देती रही हैं।

कोर्ट ने क्या कहा?

मुस्लिम महिला प्रदर्शनकारियों की ओर से दायर दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति कृष्णा दीक्षित ने बुधवार को कहा कि मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए।”महत्व के प्रश्नों की विशालता के संबंध में, जिन पर बहस की जाती है, अदालत का विचार यह है कि मुख्य न्यायाधीश के हाथों में कागजात रखे जाएं ताकि यह तय किया जा सके कि इस विषय में एक बड़ी पीठ का गठन किया जा सकता है या नहीं।” न्यायाधीश, कानूनी समाचार वेबसाइट लाइव लॉ ने यह सूचना दी।

दो याचिकाओं में से एक का तर्क है कि क्या पहनना है यह भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकार है। दूसरा शैक्षणिक संस्थानों के लिए हाल ही में राज्य सरकार के ड्रेस कोड आदेश की वैधता पर सवाल उठाता है, जो हेडस्कार्फ़ और हिजाब पर प्रतिबंध लगाता है।

उनके वकील ने यह तर्क दिया था कि हिजाब पर प्रतिबंध लगाने का सरकार का आदेश असंवैधानिक और अवैध दोनों था – उन्होंने अदालत से एक अंतरिम आदेश पारित करने के लिए भी कहा था जो छात्रों को परीक्षा से पहले कक्षाओं में भाग लेने की अनुमति देगा।

लाइव लॉ के अनुसार, न्यायमूर्ति दीक्षित ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता अंतरिम राहत की मांग कर सकते हैं जब मुख्य न्यायाधीश ने एक बड़ी पीठ बनाने का फैसला किया।