आचार्य विनोबा भावे – एक संत जो राजनीती का शिकार हुआ

विनायक नरहरि भावे जिन्हें आचार्य विनोबा भावे के नाम से जाना जाता है, उन्हें भारत का राष्ट्रीय शिक्षक भी माना जाता है। मानवाधिकारों और अहिंसा के प्रबल समर्थक, उन्हें महात्मा गांधी का आध्यात्मिक उत्तराधिकारी माना जाता है।

acharya vinoba bhave

आचार्य विनोबा भावे भूदान आंदोलन के प्रवर्तक के रूप में जाने जाते है। भावे कन्नड़, गुजराती, मराठी, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत सहित कई भाषाओं में पारंगत थे।

उन्होंने गीता का मराठी में अनुवाद किया और उसका नाम गीतई रखा। उन्होंने समाधि-मारन मानकर कई दिनों तक भोजन करने से मना कर दिया। भावे 15 नवंबर 1982 को अपने स्वर्गीय निवास के लिए प्रस्थान कर गए।

विनोबा भावे का जीवन

आचार्य विनोबा का पूरा नाम विनायक नरहरि भावे था। इनका जन्म 11 सितम्बर  1895 में महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव गागोडे में हुआ था।  पिता का नाम नरहरि शम्भू रॉव् और माता का नाम रुक्मणि देवी था।  विनोबा अपने चार भाई बहनो में सबसे बड़े थे, ऐसा सुनने में आता है कि नरहरि ने अपने चारो बेटे गाँधी को दान में दिए थे इसीलिए विनोबा में बचपन से ही गाँधी के प्रति एक झुकाव था। 

21 साल की उम्र में विनोबा गाँधी जी के आश्रम में चले गए, इसके बाद इन्होने गाँधी जी के नेतृत्व में आध्यात्म की शिक्षा ग्रहण की।  आज़ादी की लड़ाई को लेकर भी विनोबा का मत राजनैतिक नहीं था, विनोबा इस लड़ाई को एक आध्यात्मिक लड़ाई मानते थे।  

गाँधी भी विनोबा से बहुत अधिक प्रभावित हुए थे, 1921 को गाँधी ने अपने वार्धा वाले आश्रम की जिम्मेदारी विनोबा को दे दी।  1940 में असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई इसमें महात्मा गाँधी ने उन्हें पतला सत्याग्रही बताया।  गाँधी की हत्या के बाद विनोबा ने गाँधी की आध्यात्मिक विरासत को संभाला जिसका एक मुख्य अवयव गरीबो और पित्तरो की सेवा करना था और यही से शुरुआत हुई सर्वोदय आंदोलन की।  

सर्वोदय आंदोलन

सर्वोदय के अनुसार लोकतंत्र दिल्ली से गावों की तरफ नहीं बल्कि गांवो से दिल्ली क ओर चलना था।  यही गाँधी का भी सपना था।  सर्वोदय आंदोलन के दौरान ही विनोबा की ज़िन्दगी में एक काफी  बड़ा मोड़ आया।

1991 की बात है, हैदराबाद से कुछ मील दूर चिवरामपल्ली में एक सर्वोदय सम्मलेन का आयोजन हो रहा था। विनोबा भावे तब वर्धा के पौना आश्रम में रुके हुए थे। जब सम्मलेन में भाग लेने का सन्देश आया तब विनोबा पैदल ही नागपुर से निकल गए और वर्धा से होते हुए हैदराबाद चले गए। वह 300 मील की दुरी तय करके सम्मलेन में भाग लेने पहुंचे।

उस समय तेलंगाना में कम्युनिस्ट आंदोलन जोरों पर था।  यह वो समय था जब ज़मीन के मामले में सरकार आये दिन नित नए नियम लेकर आ जाती थी।  लेकिन अभी भी अधिकतर ज़मीन कुछ ही लोगो के पास थी।  आज़ादी से पहले तेलंगाना में आंदोलन चल रहा था लेकिन  आज़ादी के बाद इस आंदोलन ने अधिक उग्र रूप ले लिया।  

विनोबा भावे ने कैसे दिलाया गरीबों को उनके ज़मीन का हक़ ?

महात्मा गाँधी के शिष्य विनोबा सदैव गरीबों के हित का समर्थन करते थे।  लेकिन गाँधी की विचारधारा में हिंसा के लिए  कोई जगह नहीं थी।  11 अप्रैल, 1991 सर्वोदय सम्मलेन का आखिरी दिन, विनोबा ने यह घोषणा की कि वह पवना आश्रम तक अकेले आश्रम जायेंगे, फिर से 300 मील चलेंगे और इस बार कम्युनिस्टों के प्रभाव वाले इलाको का भी दौरा करते हुए जायेंगे।  इन दौरों में विनोबा को यह बात समझ आ गयी की मांग दोनों तरफ से जायज़ थी।

गरीब किसानो को ज़मीन का हक़ मिलना जरुरी था। लेकिनं इस चक्कर में इन किसानो को कम्युनिस्ट हिंसा का सामना करना पड़ रहा था। लोगों की शिकायत थी कि इस हिंसा का हिस्सा बनने की वजह से पुलिस भी उन्हें आये दिन परेशांन करती थी।  18 अप्रैल के दिन विनोबा नलगोंडा ज़िला पहुंचे, यह उस वक्त कम्युनिस्ट आंदोलन का केंद्र बना हुआ था।

acharya vinoba bhave in nagpur
file photo

विनोबा के ठहरने की व्यवस्था उस समय कोचमपल्ली (सर्वेश्रेष्ठ गांव की लिस्ट में शामिल) में की गयी थी। कोचमपल्ली गांव के दो तिहाई लोग उस समय भूमिहीन थे और कुछ ऐसे परिवार भी थे जिन्हे अछूत समझा जाता था। कोचमपल्ली में विनोबा का ज़ोरदार स्वागत हुआ इसी बीच विनोबा ने वहां हरिजन इलाके का भी दौरा किया तथा उनकी परेशानी जानने की कोशिश की।

लोगों ने विनोबा से कहा की अगर हमें 80 एकड़ ज़मीन मिल जाये तो पुरे गांव का गुज़ारा आराम से हो जायेगा इस पर विनोबा ने गांव के लोगो से कहा कि सरकार से ऐसी उम्मीद करना बेकार है अगर इस मसले का कोई हल नहीं निकालती तो क्या गांव वाले सब मिलकर खुद इसका हल नहीं निकल सकते है।

विनोबा की इस बात का गांव वालो पर ऐसा असर हुआ कि उनके जमींदार ने कहा कि मै दूंगा जमीन और सिर्फ अस्सी एकड़ नहीं बल्कि सौ एकड़ दूंगा।  इस प्रकरण से विनोबा को यह विचार आया की गरीबो को उनका हक़ दिलाने के लिए एक बेहतर तरीका ये भी हो सकता है। यही से शुरुआत हुई भूदान आंदोलन की।

भूदान आंदोलन

अक्टूबर 1951 में विनोबा ने आग्रह किया की समस्त भारत के लोग 5 करोड़ एकड़ भूमि दान में दे दें जो कि गरीबो में बांटी जाये। आगे चलकर यह आंदोलन ग्रामदान आंदोलन में बदला जिसमे पुरे के पुरे गांव दान में दिए जाने लगे। भूदान आंदोलन से प्रभावित होकर कई विदेशी भी विनोबा से जुड़े। इनमे से एक थे चेस्टर बोस्ट, जो कि भारत में अमेरिकी राजनैयिक हुआ करते थे। यह अपनी किताब ‘Dimension of Peace’ में लिखते है कि भूदान आंदोलन कम्युनिज्म का एक जबरदस्त विकल्प प्रस्तुत करता है, चूँकि इसमें हिंसा और जोर जबरदस्ती नहीं है इसीलिए ये मानव गरिमा को बनाये रख के बदलाव लाने की क्षमता भी रखता है।  

आगे चलकर समाजवादी नेता जयप्रकश नारायण भी इस आंदोलन से जुड़े। 1957 तक जब भूदान आंदोलन का असर कुछ कम होने लगा, विनोबा की मनसा तब भी स्वच्छ रही। लेकिन तब तक इसमें कुछ ऐसे तत्त्व जुड़ चुके थे कि इसमें बहुत हेराफेरी होने लगीं क्यूंकि मामला ज़मीन का था।

कई जगह सिर्फ नाम के लिए जमीनें दान में दी गयी, हक़ मालिकों का ही रहा। वही कई जगह बंजर ज़मीन बाटकर नाम कमाया गया। इन सब कारणों से भूदान आंदोलन धीरे धीरे ख़त्म होता गया। सर्वोदय का भी ऐसा असर नहीं दिख रहा था जैसी जे. पी. को उम्मीद थी। इसके बावजूद विनोबा अपने आश्रम से समाज सुधार में लगे रहें। हरिजनों के कल्याण के लिए उन्होंने कई कार्य किये; मैला धोने की परंपरा का विरोध किया, यहाँ तक की खुद मैला सर पर लाड कर चलें।  

साठ और सत्तर के दशक में विनोबा का रुतबा वही था जो पहले महात्मा गाँधी का हुआ करता था। यह वो दौर था जब विनोबा भावे के गुण को हनुमान चालीसा की तरह सबके दिमाग में बिठा लिया गया था। विनोबा ने कभी किसी राजनैतिक पक्ष का समर्थन नहीं किया। हालाँकि सब उनका बहुत सम्मान करते थे, नेहरू के लिए तो वो बापू के समान ही थे और इंदिरा गाँधी भी उन्हें पिता समान मानती थी। इसके बावजूद विनोबा अपने सार्वजनिक जीवन में इंदिरा को प्रंधानमंत्री इंदिरा जी कहकर ही पुकारते थे। 

इसके बाद 1975 का दौर आया।  

आपातकाल की घोषणा तथा इसका विनोबा पर प्रभाव

यह बात 1975 के साल की है जब देश में आपातकालीन लगी हुई थी, जिसमे कितने नेता जेल गए। विपक्ष को लीड कर रहे गाँधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण जिनका कद देश में सबसे ऊँचा हुआ करता था। वही दूसरी तरफ एक दूसरा ख़ेमा था इंदिरा गाँधी की सत्ता में सृदढ़ राज़ चला रहे संजय गाँधी का। इन दोनों खेमों के अलावा एक तीसरा ख़ेमा भी था जिसमे सिर्फ केवल एक ही व्यक्ति था जिनका नाम था आचार्य विनोबा भावे।

जयप्रकाश नारायण और विनोबा भावे दोनों ही गांधीवादी नेता थे। जे.पी. यह मानकर चल रहें थे कि विनोबा के समर्थन विपक्ष को ही रहेगा और वो सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज अवश्य बुलंद करेंगे। लेकिन इत्तेफाक कुछ यूं बना कि 25  दिसंबर 1974 से विनोबा ने एक साल मौन धारण किया हुआ था।

25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा हो गयी जिस वक्त विनोबा मौन धारण किये हुए थे और उनकी दिलचस्पी चुनावी राजनीति में वैसे भी कुछ खास थी नहीं।  विनोबा गाँधी की आध्यात्मिक विरासत को लेकर अपना कदम आगे बढ़ा रहे थे।  

एक संत जिसे सरकारी संत बना दिया गया

सरकार को लगा की एक बार उन्हें विनोबा से मुलाकात अवश्य करनी चाहिए इसी उद्देश्य से वसंत साठे, जो कि बाद में सुचना एवं प्रसारन मंत्री भी बने, विनोबा से मिलने गए। साठे और विनोबा की मुलाकात हुई; विनोबा मौन रखे हुए थे। उन्होंने अपने पास रखी एक किताबी साठे की तरफ बढ़ा दी जिसमे लिखा हुआ था ‘अनुशाशन-पर्व’

इसके बाद सरकार ने रातोरात एक ऐसा खेल खेला जिसमे विनोबा संत से एक सरकारी संत बन गए। विनोबा के नाम से अनुशाशन-पर्व के पोस्टर्स छपवा दिए गए। सरकार ने ऐसा प्रोपोगंडा चलाया की जिसमे विनोबा कह रहें है कि ये आपातकाल नहीं बल्कि एक अनुशाशन पर्व है; जबकि विनोबा ने तो कुछ कहा ही नहीं था। यह प्रोपोगंडा सफल रहा सरकार के समर्थक ही नहीं बल्कि विरोधी भी यह मानने लगे की विनोबा आपातकाल के पक्षधर है। उन्हें सरकारी संत कहा जाने लगा।  

आपातकाल के 6 महीने बाद 25 दिसंबर को विनोबा ने अपना मौन व्रत तोडा उसके बाद इस मुद्दे पर उन्होंने अपनी पूरी बात रक्खी और लोगो को सब समझाया। उस वक्त उनके कहे गए शब्द कुछ इस प्रकार थे –

अनुशाशन-पर्व महाभारत से आया शब्द है, लेकिन इससे पहले यह उपनिषद में भी आया। ये प्राचीन काल का एक रिवाज था जिसमे विद्यार्थी 12 साल आचार्य के पास रहकर विद्याभ्यास करता था।  जब वह अपना विद्याभ्यास पूर्ण कर अपने घर जाता था तब आचार्य उसको अंतिम उपदेश देते थे जिन पर ज़िन्दगी भर उनको चलना है। उन उपदेशो का जिक्र उपनिषद में है।”

इसके बाद विनोबा ने कहा कि जिस अनुशाशन की बात वो कर रहे थे वो आचार्य का होता है न की सत्ता का। सत्ता के पास सिर्फ शाशन होता है। इन्होने कहा कि अगर आचार्यो के हिसाब से दुनिया चलेगी तो दुनिया में शांति रहेगी।

इस दौरान जे.पी और विनोबा में अनबन के खूब किस्से सुनने को मिलने लगे लेकिन इनमें भी कोई सच्चाई देखने को नहीं मिलती। इन सब के बाद विनोबा ने सार्वजानिक जीवन से अवकाश ले लिया। ये बात सब जानते की उनके खाली स्थान को कभी किसी के द्वारा आज तक नहीं भरा जा सका है। विनोबा और जे.पी. का रिश्ता आजीवन स्नेहपूर्ण बना रहा, यहाँ तक की जब जे.पी. का निधन हुआ तो इनकी अस्थिया विनोबा के ब्रह्मविद्या मंदिर में एक पेड़ के नीचे विसर्जित की गयी थी और उन पेड़ो पर जयप्रकाश नारायण के नाम की तख्ती लगायी गयी।  

विनोबा चुनावी राजनीति में कोई दखल नहीं देना चाहते थे, इसीलिए कभी खुलकर सरकार के खिलाफ भी कुछ नहीं बोले न ही पक्ष में बोले। लेकिन आपातकाल के दौरान सरकार से उनकी अनबन चलती रही।

विनोबा गौ हत्या पर पाबन्दी लगाना चाहते थे और यह आदर्श उन्हें महात्मा गाँधी से मिला था। उनके आश्रम से निकलने वाली पत्रिका ‘Maitri’ में गौ हत्या के मुद्दे पर सरकार की तीखी आलोचना छपती थी। तब सरकार ने आश्रम में पुलिस भेजकर पत्रिका की सभी copies जब्त करवाई थी।  विनोबा ने राजनीति से किनारा किया लेकिन राजनेताओं से नहीं।

जब इंदिरा सत्ता से बेदखल हुई तो वो विनोबा से मिलने आश्रम पहुंची तब भी उन्होंने यु दर्शाया की मानो विनोबा ने सरकार को खुलकर समर्थन दे दिया हो जबकि ऐसा नहीं था। जनता पार्टी की सरकार के रहते हुए जे.पी. और प्रधानमंत्री मोरारजी भी विनोबा से मिलने वहा जाते थे।  15 नवंबर 1982 को लम्बी बिमारी के वर्धा में विनोबा का देहांत हो गया। तब इंदिरा रूस की यात्रा पर थी और यात्रा बीच में छोड़कर भारत लौटी थी। इस घटना को भी सरकार और विनोबा वाले एंगल से कवर किया गया था जबकि इसका कही कोई उल्लेख नहीं मिलता कि विनोबा ने सरकार या किसी नेता का खुलकर कोई समर्थन किया हो।

वो राजनीति से दूर रहना पसंद करते थे और बस सामाजिक मुद्दों और आंदोलनों पर अपनी राय दिया करते थे। 

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मान

विनोबा भाबे वर्ष 1958 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त करने वाले पहले अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय व्यक्ति थे। उन्हें 1983 में मरणोपरांत भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया था।